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सोमवार, जून 21, 2021

How to confirm Misuse of Energy Weapons? Part-1 | ऊर्जा हथियारों के दुरुपयोग की पुष्टि कैसे करें? भाग-1

डिस्क्लेमर : इस लेख में दी गई जानकारियों के सही होने का मैं किसी प्रकार से कोई दावा नहीं कर सकता हूं। मैं पाठकों से निवेदन करता हूं कि इस लेख में दी गई किसी भी बात पर आंख बंद करके भरोसा न करें। यदि किसी को भी इस लेख को पढ़कर कोई गलतफहमी होती है या किसी प्रकार का नुकसान होता है, तो उसमें मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।

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                                                                             भाग-1

"ऊर्जा हथियार" का अर्थ है विभिन्न प्रकार की ऊर्जा का दुरुपयोग हथियार के तौर पर करना। कई देशों में इस प्रकार के हथियारों पर काम चल रहा है। विज्ञान और टेक्नोलॉजी आधारित हथियारों को देश की सुरक्षा के लिए बनाना और बात है जबकि मासूम और निहत्थे लोगों पर उनका अवैध इस्तेमाल होना बिल्कुल ही अलग और गंभीर मामला है जिसे आतंकवाद कहना ही उपयुक्त है। मगर दुःख की बात है कि अभी तक ऊर्जा हथियारों और नवीनतम टेक्नोलॉजी के दुरुपयोग को रोकने के लिए कोई कानून नहीं बना है और यह स्थिति शायद दुनिया के सभी देशों में है। इस कारण कुछ भ्रष्ट ताकतें बिना किसी भय के आम लोगों पर इन हथियारों का इस्तेमाल कर रही हैं।

ऊर्जा हथियारों का दुरुपयोग बहुत बड़े स्तर पर हो रहा है। दुनिया के अलग-अलग देशों में रहने वाले लाखों टारगेटेड इंडिविजुअल्स इस बात का दावा करते हैं कि उनके शरीर और मस्तिष्क को विभिन्न प्रकार के ऊर्जा हथियारों से निशाना बनाया जाता है। मगर इस विषय पर कोई आधिकारिक जानकारी न होने की वजह से ज्यादातर लोगों को इस तरह के हाई-टेक अपराधों के बारे में कुछ भी पता नहीं है। ऐसे में अगर किसी व्यक्ति पर ऊर्जा हथियारों का इस्तेमाल होता है तो उसे कैसे पता चलेगा कि उसके शरीर अथवा मस्तिष्क को टारगेट किया जा रहा है? क्या कोई तरीका है जिससे ऊर्जा हथियारों के दुरुपयोग की पुष्टि की जा सकती है? प्रस्तुत लेख इसी विषय पर है।

इस लेख के प्रथम भाग में ऊर्जा हथियारों के दुरुपयोग से उत्पन्न होने वाले लक्षणों की मदद से उसके दुरुपयोग की पुष्टि के तरीकों पर चर्चा होगी तथा दूसरे भाग में टेक्नोलॉजी की मदद से किसी भी प्रकार की ऊर्जा की संदेहजनक मौजूदगी का पता लगाने के तरीकों पर चर्चा होगी जो कि अधिक व्याहवारिक और बेहतर तरीका है। तो चलिए, लेख शुरू करते हैं।


👉 Factors which can effect the results for detecting energy weapons


लक्षणों की मदद से ऊर्जा के दुरुपयोग का पता लगाने के तरीकों पर चर्चा करने से पहले निम्नलिखित कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है, जिनसे परिणाम प्रभावित हो सकते हैं :

1. Seventh Sense - ऊर्जा हथियारों का इस्तेमाल होने पर शरीर, वातावरण, वस्तुओं आदि में कई प्रकार के लक्षण उत्पन्न होते हैं। मगर इन लक्षणों को महसूस करने के लिए व्यक्ति की इन्द्रियों को प्रबल और संवेदनशील होना जरूरी है। परंतु हर व्यक्ति की इन्द्रियां अलग ढंग से काम करतीं हैं। ऐसे में किसी की पांचों इन्द्रियां तेज हो सकती हैं तो किसी की काफी कमजोर। इस वजह से बहुत से लोगों को ऊर्जा से उत्पन्न लक्षणों की पुष्टि करने में दिक्कत हो सकती है। 

2. Personalized Advertisement Style Targeting - तथाकथित गैंग-स्टाल्कर्स व्यक्ति-आधारित विज्ञापन की तर्ज पर लोगों को निशाना बनाते हैं। अर्थात लोगों की दिनचर्या, हैसियत, परेशानी, बीमारी, खान-पान आदि के हिसाब से उन्हें अलग-अलग तरीके से निशाना बनाया जा सकता है। जिस कारण से लक्षणों को पकड़ने या उनकी पुष्टि करने में दिक्कत हो सकती है।

3. Targeted only at a particular time or place - ऐसा भी हो सकता है कि पीड़ित पर किसी खास समय या जगह पर ही ऊर्जा हथियारों का इस्तेमाल होता हो। उदाहरण के लिए सोते वक्त या दफ्तर में बैठे वक्त ही किसी व्यक्ति पर ऊर्जा हथियार चलाए जा रहे हों। बाकि के समय में अगर वह व्यक्ति ऊर्जा हथियार के चलने की पुष्टि करने की कोशिश करता है तो उसे यह गलतफहमी हो सकती है कि उस पर ऊर्जा का इस्तेमाल नहीं हो रहा है।

4. Weapons Variety - गैंग-स्टाल्कर्स कई प्रकार की ऊर्जा का दुरुपयोग करते हैं जैसे कि ध्वनि ऊर्जा, वायरलेस बिजली, विद्युतचुम्बकीय रेडिएशन आदि। इसके अलावा ऊर्जा आधारित चिकित्सकीय उपकरणों एवं नवीनतम टेक्नोलॉजी का भी दुरुपयोग अवैध जासूसी एवं प्रताड़ना के लिए किया जाता है। इस वजह से भी पुष्टि करने में दिक्कत होती है।

5. Wrong ideas about being targeted- कोई यह महसूस करने लगे कि उस पर ऊर्जा हथियारों का इस्तेमाल हो रहा है, जबकि वास्तव में ऐसा न हो रहा हो, तो उसे बेवजह मानसिक तनाव हो सकता है। इसी प्रकार से अगर किसी को सच में निशाना बनाया जा रहा हो और वो इस बात से अनभिज्ञ हो तो स्थिति और भी ज्यादा खराब होगी। इसलिए ऊर्जा हथियारों के दुरुपयोग की पुष्टि करना आसान कार्य नहीं है।

6. Illness might not be confused otherwise - यदि किसी व्यक्ति को कोई बीमारी है तो उसे बहुत ज्यादा सावधानी से काम लेना चाहिए।  ऊर्जा हथियारों से शरीर में कई प्रकार की बीमारी के लक्षण उत्पन्न किए जा सकते हैं। ऐसे में बीमारी को लेकर किसी भी प्रकार का भ्रम जानलेवा हो सकता है। इसलिए कोई इलाज चल रहा हो तो उसे जारी रखना चाहिए। संदेह होने पर इस विषय पर अपने परिवार और विश्वसनीय दोस्तों एवं डॉक्टर से सलाह लें मगर बीमारी होने पर इलाज जरूर करवाएं। (नोट : इस पॉइंट को अतिरिक्त डिस्क्लेमर के तौर पर भी पढ़ें।)

7. Extra-Sensitive or Insensitive - कुछ लोग किसी बीमारी, एलर्जी, स्वभाव आदि की वजह से अतिसंवेदनशील हो सकते हैं, जिस कारण उन्हें बिना वजह ही ऊर्जा के लक्षण महसूस हो सकते हैं। इसके विपरीत, कुछ लोग खान-पान, रहन-सहन, आदत आदि के कारण असंवेदनशील हो सकते हैं, जैसे कि शराब पीना, कान में इयरफोन लगाकर तेज आवाज में गाना सुनने की आदत आदि के कारण कुछ लोगों को ऊर्जा हथियारों के लक्षण महसूस नहीं होते। 


👉 How to confirm misuse of Energy Weapons?


ऊर्जा हथियारों से बचाव की सबसे पहली शर्त है, उनके इस्तेमाल होने की पुष्टि करना। व्यक्ति को समय पर पता चल जाए कि उसे ऊर्जा हथियारों से निशाना बनाया जा रहा है तो वह अपने व परिवार के बचाव के बारे में सोच सकता है तथा संभव हो तो बहुत कुछ कर भी सकता है। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जानकारी के अभाव में ऐसे हथियारों से उत्पन्न लक्षणों को जादू-टोना या (शारीरिक अथवा मानसिक) बीमारी भी समझ सकता है। मगर सिर्फ लक्षणों से ऊर्जा हथियारों के दुरुपयोग को पकड़ना बहुत ही दुष्कर कार्य है। ऐसे हथियारों के लक्षण बीमारी, थकान, कमजोरी, पुरानी चोट आदि से उत्पन्न लक्षणों से बहुत मिलते-जुलते हो सकते हैं। इसलिए इस तरीके का इस्तेमाल बहुत संयम और सावधानी से करना पड़ता है। इस तरीके से पुष्टि करने के लिए महीनों का समय भी देना पड़ सकता है।

मगर डूबते को तिनके का सहारा होता है। अधिकतर टारगेटेड इंडिविजुअल्स विज्ञान की पढ़ाई, थोड़ी-बहुत जानकारी या शौक की मदद से ही ऊर्जा हथियारों की जानकारी जुटाने की कोशिश करते हैं।इस कार्य में इंटरनेट का सहारा भी पूरी सावधानी के साथ लेना पड़ता है। अगर विज्ञान के साथ-साथ कॉमन सेंस का इस्तेमाल भी किया जाए तो बहुत हद तक ऊर्जा के दुरुपयोग की पुष्टि की जा सकती है। तो चलिए, देखते हैं कि लक्षणों की मदद से ऊर्जा के दुरुपयोग का कैसे पता लगाया जा सकता है :

1. Symptoms of Energy Weapons : ऊर्जा को भले ही हम देख नहीं सकते हैं मगर उसके चलने पर शरीर या मस्तिष्क में कई तरह के प्रभाव उत्पन्न होते हैं। उदाहरण के लिए बिजली का झटका लगने पर बिजली की तीव्रता के अनुसार सनसनाहट, तेज दर्द या जलने के लक्षण महसूस होते हैं, खाना बनाते वक्त उसमें से गर्मी या ताप महसूस होता है, पार्टी में संगीत का आयोजन हो तो तेज ध्वनि के कारण शरीर में कम्पन भी महसूस होता है। इसके अलावा गर्मी से पसीना आना, बिजली के झटके से घबराहट तथा तेज ध्वनि से सिरदर्द आदि लक्षण भी उत्पन्न हो सकते हैं।

इसी प्रकार से ऊर्जा के चलने पर कुछ न कुछ लक्षण अवश्य उत्पन्न होते हैं, जैसे कि पल्स, चुभन, दर्द, गर्मी, कंपन, सनसनी (Sensation), दिल की धड़कन बढ़ना या दर्द होना आदि। इसके अलावा ऊर्जा की तीव्रता के अनुसार उल्टी आना, बेचैनी, सर घूमना, कमजोरी, वजन कम होना, शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द आदि लक्षण हो सकते हैं। ऊर्जा से उत्पन्न लक्षणों पर कोई गम्भीरतापूर्वक गौर करे तो वह उन्हें सामान्य लक्षणों से अलग कर सकता है। ध्यान रहे कि बीमारी आदि में भी बताए गए लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं मगर ऊर्जा हथियार बार-बार या लगातार चल रहे हों तो उससे होने वाले लक्षण बेवजह उत्पन्न होते रहेंगे।

2. Science is Neutral : विज्ञान के मूल सिद्धांत निष्पक्ष होते हैं जिस कारण वे भेद-भाव नहीं कर सकते। इसलिए कोई भी  विज्ञान के सिद्धांतों पर गौर करके तर्कपूर्ण ढंग से सोचेगा तो उसे पता चल जाएगा कि उस पर ऊर्जा हथियारों का इस्तेमाल हो रहा है या नहीं? ऊर्जा का नियम है कि उसे बनाया या नष्ट नहीं किया जा सकता है तथा वो एक रूप से दूसरे में परिवर्तित होती है। उदाहरण के लिए ऊर्जा स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy) से गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) या गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) से ऊष्मा ऊर्जा (Thermal or Heat Energy) में परिवर्तित हो जाती है।

इसी प्रकार से ध्वनिक ऊर्जा (Sound Energy), जैसे कि पराश्रव्य (Ultrasound) या अपश्रव्य (Infrasound) चलने पर उसकी ऊर्जा शरीर में कम्पन तथा ऊष्मा ऊर्जा उत्पन्न करेगी। तार रहित बिजली या कम्पन के चलने पर ऊष्मा ऊर्जा उत्पन्न होगी। इसके अलावा झटका लगना, दर्द होना, कमजोरी, कम्पन, उल्टी आना आदि लक्षणों से ऊर्जा के चलने का एहसास हो जाता है। महान इंजीनियर एवं वैज्ञानिक निकोला टेस्ला का कथन इस प्रकार है :-



3. Gang-Stalkers enjoy victims suffering : कई बार गैंग-स्टाल्कर्स जानबूझ कर पीड़ित व्यक्ति को खुद एहसास दिलाते हैं कि उसे ऊर्जा हथियारों से टारगेट बनाया जा रहा है। ऐसा वे व्यक्ति को डराने-धमकाने, लाचार और असहाय महसूस कराने, परपीड़ा का सुख पाने आदि कारणों के लिए करते हैं। इसके विपरीत पैसेवाले और सामाजिक व्यक्ति को छुपकर निशाना बनाया जाता होगा। गैंग-स्टाल्कर्स किसी व्यक्ति को एहसास दिलाकर निशाना बना रहे हों तो उसे आसानी से पता लग जाएगा कि उस पर ऊर्जा हथियारों का इस्तेमाल हो रहा है। मगर किसी पर यदि चुपचाप निशाना बना रहे हों तो लक्षणों की मदद से ऊर्जा के चलने का पता लग सकता है बशर्ते कि पीड़ित इस विषय के प्रति जागरुक हो। 

4. Gang Stalking : गैंग-स्टॉल्किंग और ऊर्जा हथियारों का प्रयोग, दोनों साथ-साथ हो सकते हैं। ऐसे में गैंग-स्टॉल्किंग खुद ऊर्जा के दुरुपयोग होने का लक्षण हो सकती है। व्यक्ति को दोनों ही विषयों के प्रति सावधान रहना चाहिए।

5. Yoga & Meditation : प्राणायाम, शवासन, ध्यान आदि योगाभ्यास करने वालों को ऊर्जा हथियारों के लक्षणों का जल्दी आभास हो सकता है बशर्ते कि वे इस विषय के प्रति जागरूक हो।

6. Unusual Symptoms : अगर किसी व्यक्ति को अकारण ही एक-साथ कई अजीब लक्षण महसूस होने लगे हों - (जैसे कि बेहोशी जैसी नींद आने लगी हो, वातावरण में गुम-शोर सुनाई देता हो, घर की दीवारों, फर्नीचर आदि में कंपन महसूस होने लगे, पल्स महसूस होने के साथ-साथ शरीर के किसी भी हिस्से में अचानक हल्के झटके (jerk) से लेकर तेज दर्द महसूस हो, अचानक तेज गर्मी या सर्दी महसूस होने लगता हो, बिना कारण तेजी से वजन गिरने लगा हो आदि) तो उसे ऊर्जा के दुरुपयोग होने की आशंका से इंकार नहीं करना चाहिए। इस विषय पर मैं अधिक जानकारी देने का प्रयास करूंगा। (डिस्क्लेमर : बताए गए लक्षणों का कोरोना वायरस से कोई सम्बन्ध नहीं है।)

7. Confirmation with Technology : टेक्नोलॉजी की सहायता से ऊर्जा हथियारों के चलने की पक्के तौर पर पुष्टि की जा सकती है, जिसके बारे में इस लेख के भाग-2 में चर्चा होगी।

उपरोक्त जानकारियां सैद्धांतिक और सामान्य ज्ञान की बातें हैं मगर टेक्नोलॉजी के बिना ऊर्जा के दुरुपयोग की पुष्टि करने के यही मौलिक तरीके हैं। किसी अन्य लेख में मैं उपरोक्त जानकारियों के व्यावहारिक इस्तेमाल की कुछ टिप्स एवं ट्रिक्स भी आपको बताने का प्रयास करूंगा। आपको यह लेख ज्ञानवर्धक लगा होगा, मैं ऐसी उम्मीद करता हूं। साथ ही मैं सभी से इस लेख के भाग-2 को पढ़ने का निवेदन भी करता हूं। 

धन्यवाद।

बुधवार, अगस्त 05, 2020

Smart Dust : a threat to privacy & security | स्मार्ट डस्ट : निजता और सुरक्षा पर मंडराता खतरा

Some thoughts on Neural Dust


 
मैंने इस ब्लॉग के लेख "आपके विचारों को पढ़ा जा सकता है! (2)" में न्यूरल डस्ट के बारे में जिक्र किया था। इस लेख में मैंने न्यूरल डस्ट के बारे में जो लिखा था, वो इस प्रकार है :-

"अभी न्यूरल डस्ट (neural dust) पर काम चल रहा है जो कि सिर्फ 3 मिलीमीटर लम्बा, 1 मिलीमीटर ऊंचा और 4/5 मिलीमीटर मोटा नर्व सेंसर है जो कि पूरी तरह वायरलेस और बैटरी रहित है। इसका इस्तेमाल शरीर के अंदर डालकर नर्व और मसल्स का अध्ययन, नियंत्रण और निगरानी के लिए होगा।  इसके अलावा इसे न्यूरॉन एक्टिविटी की निगरानी हेतु इस्तेमाल में लाया जाएगा। विकिपीडिया की माने तो आगे चलकर चिकित्सा हेतु मस्तिष्क में हजारों न्यूरल डस्ट डाले जाएंगे। न्यूरल डस्ट को एक प्रकार का ब्रेन कंप्यूटर इंटरफ़ेस भी कहा जा सकता है।"

पिछले कुछ समय से मैं इसी न्यूरल डस्ट के बारे में विचार कर रहा था कि इस अति सूक्ष्म और बहु-उपयोगी यंत्र का प्रयोग सिर्फ चिकित्सा के क्षेत्र तक ही सिमित क्यों है? क्या इस यंत्र का दुरुपयोग किसी की जासूसी करने के लिए नहीं हो सकता है? क्या ऐसा हो सकता है कि शरीर के डाटा को चुराने के लिए इस यंत्र को शरीर के भीतर डालना की आवश्यकता ही न हो, बल्कि बाहर से ही शरीर की महत्वपूर्ण जानकारियों की चोरी की जा सकती हो? क्या ऐसा भी हो सकता है कि पीड़ित को पल्स मारने, माइंड रीडिंग आदि कार्यों के लिए भी इस तरह के यंत्र का इस्तेमाल किया जा रहा हो? नोट:- पल्स पर कुछ जानकारी मैंने इस ब्लॉग के लेख "ध्वनि : उपयोग और दुरुपयोग (5) Part-2" में दी थी। 

मैं मन ही मन सोचा करता था कि अगर इन न्यूरल डस्ट सेंसर्स और कैमरा को दीवारों या फर्नीचर के दरारों में फिट कर दिया जाए या इन्हें किसी भी चीज में छिपा दिया जाए तो व्यक्ति की हर गतिविधि पर नजर रखी जा सकती है। सोच कर देखिए, इस तरह के अति सूक्ष्म सेंसर्स और कैमरा आदि के दुरुपयोग से किसी भी व्यक्ति की निजता और सुरक्षा के लिए कितना बड़ा और गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है? सबसे बड़ी बात ये है कि इस तरह के यंत्र अति सूक्ष्म होने के अलावा वायरलेस और बैटरी रहित होते हैं, जिस कारण इन्हें खोज पाना लगभग असंभव हो जाता है। 

इस विषय पर मैं इंटरनेट पर जानकारी खोजने की कोशिश करता था। इसी प्रयास में मुझे "स्मार्ट डस्ट (Smart Dust)" के बारे में जानकारी मिली है, जिसके द्वारा मुझे उपरोक्त कुछ सवालों का जवाब मिला है। मगर क्या माइंड रीडिंग और पीड़ितों पर पल्स चलाने के लिए स्मार्ट डस्ट का इस्तेमाल होता है? इस बारे में अभी जानकारी नहीं मिली है। 

विकिपीडिया के अनुसार, "The term neural dust is derived from "smart dust", as the sensors used as neural dust may also be defined by this concept." अर्थात न्यूरल डस्ट की परिभाषा स्मार्ट डस्ट की परिधि में ही आती है। 

What is Smart Dust?




विकिपीडिया के अनुसार, "Smartdust is a system of many tiny microelectromechanical systems (MEMS) such as sensors, robots, or other devices, that can detect, for example, light, temperature, vibration, magnetism, or chemicals. They are usually operated on a computer network wirelessly and are distributed over some area to perform tasks, usually sensing through radio-frequency identification. Without an antenna of much greater size the range of tiny smart dust communication devices is measured in a few millimeters and they may be vulnerable to electromagnetic disablement and destruction by microwave exposure."

उपरोक्त परिभाषा का हिंदी अनुवाद मैं नहीं कर रहा हूं। मगर इस परिभाषा से इतना तो ज्ञात होता ही है कि स्मार्ट डस्ट विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म सेंसर्स, रोबोट्स तथा अन्य यंत्र हो सकते हैं। तो क्या ऐसा हो सकता है कि जासूसी आदि के लिए कई तरह के सूक्ष्म सेंसर्स और कैमरों का इस्तेमाल एक साथ होता हो? उदाहरण के लिए सामान्य कैमरा, नाईट विज़न कैमरा (इंफ्रारेड या बिना इंफ्रारेड), थर्मल सेंसर्स, अल्ट्रासोनिक सेंसर्स, मोशन सेंसर्स, वाइब्रेशन सेंसर्स आदि सूक्ष्म यंत्रों को अगर दीवार , फर्निचर आदि में अलग-अलग फिट कर दिया जाए तो इन उपकरणों को एक साथ या अलग-अलग इस्तेमाल करके न सिर्फ पीड़ित व्यक्ति के ऊपर चौबीसों घंटे नजर रखना संभव है बल्कि उसके शरीर के निजी डाटा को भी चुराया जा सकता है।
 
आजकल तो मोबाइल अल्ट्रासाउंड के उपकरण भी बाजार में उपलब्ध हो गए हैं। मैंने इस ब्लॉग के लेख "ध्वनि : उपयोग और दुरुपयोग (5) Part-2" में आपको "हैंडहेल्ड अल्ट्रासाउंड डिवाइस (Handheld Ultrasound Device)" के बारे में बताया था। ऐसे में कोई बड़ी बात नहीं होगी अगर स्मार्ट डस्ट के कुछ सेंसर्स पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड की तरह ही पीड़ित व्यक्ति के शरीर के अंदरूनी अंगों, नसों आदि को स्कैन करके रेडियो या अन्य फ्रीक्वेंसी के माध्यम से गैंग स्टाल्कर के कंप्यूटर या मोबाइल में सारी जानकारी भेजते हों।

Privacy and Security Threats from Smart Dust


हो सकता है कि मेरी कई बातें अनुमानों पर आधारित हो या पूर्णतः कपोल-कल्पना पर आधारित हो, मगर स्मार्ट डस्ट, निजता और सुरक्षा के लिए कई गंभीर खतरे पैदा करती है। इस विषय पर ज्यादा जानकारी के लिए आप निम्नलिखित लिंक्स को क्लिक करें:-

हॉलीवुड की एक फिल्म है "The Trueman Show" जिसमें नायक एक साधारण जीवन जी रहा होता है, इस बात से बेखबर कि उसके जीवन को हर समय, चौबीसों घंटे, एक रियलिटी टीवी प्रोग्राम के लिए फिल्माया जाता है। क्या असल जिंदगी में भी कुछ भ्रष्ट ताकतें अपने स्तर पर "The Trueman Show" चला रही हैं? बहुत से टारगेटेड इंडिविजुअल्स जरूर इस प्रकार का दावा करते हैं, जिस के लिए उन्हें पागल समझा जाता है। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्मार्ट डस्ट, इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स जैसी टेक्नोलॉजी हर किसी की निजता और सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती पेश कर सकती है।

आने वाले समय में जहां एक तरफ स्मार्ट डस्ट एवं अन्य सेंसर्स हर किसी के लिए सरदर्द का सबब बनेंगे, तो वहीं दूसरी तरफ, इस तरह की टेक्नोलॉजी के दुरुपयोग को रोकने के लिए स्मार्ट डस्ट ही मददगार भी साबित होंगे, ऐसा मेरा मानना है। यही स्मार्ट डस्ट जासूसी स्मार्ट डस्ट उपकरणों का पता लगाने तथा उनकी फ्रीक्वेंसी को भांपकर रोकने जैसे कार्यों को अंजाम देने में सक्षम हो सकते हैं। इसे ही तो "Science Neutrality" या विज्ञान की निष्पक्षता कह सकते हैं!
धन्यवाद।

मंगलवार, अगस्त 04, 2020

Eureka! Ultrasound can be detected

The reason for creating this blog


आज मैं आपको बताना चाहता हूं कि मैंने यह ब्लॉग "मौलिक रचना" क्यों बनाया है? इस ब्लॉग को बनाने के पीछे मेरे दो मकसद थे। एक तो मैं विज्ञान और टेक्नोलॉजी के दुरुपयोग और उनमें व्याप्त भ्रष्टाचार के बारे में लोगों को जागरूक और सावधान करना चाहता था। दूसरा कारण ये है कि मैं लोगों के मन से यह गलतफहमी मिटाना चाहता हूं कि विज्ञान-टेक्नोलॉजी के दुरुपयोग, ऊर्जा हथियार, इंसानी शरीर हैकिंग आदि को रोका नहीं जा सकता या इससे लड़ा नहीं जा सकता है। मगर इस लक्ष्य पर मैं कितना सफल हो सकूंगा, ये तो मुझे नहीं पता परंतु मैं प्रयास पूरा करूंगा।

असल में विज्ञान अपने आप में पूर्णतः निष्पक्ष है तथा उसके मूलभूत सिद्धांत नहीं बदल सकते। इसी कारण से भ्रष्ट ताकतों को विज्ञान और टेक्नोलॉजी का छिपकर दुरुपयोग करना पड़ता है। इसलिए सबसे पहली जरूरत तो यही है कि हर व्यक्ति विज्ञान और टेक्नोलॉजी में हो रहे नित नए आविष्कारों और खोजों के बारे में जानकारी रखे। साथ ही, अपने बच्चों को भी विज्ञान में रुचि रखने के लिए प्रोत्साहित करें।

मगर सिर्फ नए आविष्कारों और खोजों के बारे में जानकारी रखना भर ही काफी नहीं है। आप को उन पर विचार-मंथन भी करना होगा कि क्या नए वैज्ञानिक उपलब्धियों का दुरुपयोग हो सकता है या नहीं? उदहारण के लिए आजकल कृत्रिम बुद्धिमत्ता और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (Internet of Things या IoT) के बारे में बहुत चर्चा है। इस पर सोचिए कि क्या इनकी मदद से हैकिंग हो सकती है या नहीं तथा इनके क्या फायदे-नुकसान होंगे? या फिर मोबाइल खरीदने पर उसमें जो पहले से ही एप्प मौजूद होते हैं उन्हें क्यों हटाया नहीं जा सकता? जबकि उनमें कई ऐसे एप्प होते हैं जो कि खुद भी गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किए जा सकते हैं मगर उन्हें भी क्यों हटाया नहीं जा सकता है? आदि-आदि। 

Can Ultrasound be detected?

चलिए, इस लेख के विषय पर आते हैं। क्या पराश्रव्य की उपस्थिति का पता लगाया जा सकता है? अगर ऐसा हो जाए तो आने वाले समय में पीड़ित के शरीर पर पराश्रव्य के विभिन्न दुरुपयोग होने पर उसे समय रहते ही इस बारे में पता चल जाएगा। साथ ही ध्वनिक ऊर्जा के दुरुपयोग का प्रमाण भी प्राप्त हो सकेगा। फिलहाल निम्नलिखित कुछ तरीकों से पराश्रव्य की उपस्थिति का पता लगाया जा सकता है:-
1. Thermal Detector
2. Sensitive Flame Method
3. Kundt's tube Method
4. Piezo-Electric Detector
5. Using Radiometer
6. For mobile, some kind of extension for blocking the Ultrasound, just like Ad-blocker

उपरोक्त तरीकों के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए निम्नलिखित लिंक्स को क्लिक कीजिए:-

How Ultrasound detection can be very important?

पराश्रव्य के मापन, उपस्थिति आदि का पता लगाने वाला यंत्र बन जाए और साथ में आटोमेटिक अलार्म सिस्टम भी इसमें हो तो पराश्रव्य का दुरुपयोग होना बहुत मुश्किल हो जाएगा। उपरोक्त डिटेक्टर में थर्मल डिटेक्टर, रेडियोमीटर तथा दाबविद्युतिकी डिटेक्टर (Piezoelectric or Quartz crystal Detector) की विधि से इस प्रकार का यंत्र बनाया जा सकता है। थर्मल डिटेक्टर से तो अन्य ऊर्जा हथियारों जैसे कि माइक्रोवेव, कंपन, अपश्राव्य आदि का भी पता लगाया जा सकता है। बल्कि शरीर पर ऊर्जा हथियारों से चोट होने पर वहां उत्पन्न गर्मी को भी ये दर्शा पाएगा। पराश्रव्य की उपस्थिति का अगर पता चले तो उसे रोकने के भी उपाय किए जा सकते हैं। 
(नोट :-दाबविद्युतिकी पर मैं किसी अन्य लेख में चर्चा करूंगा।) 

पराश्रव्य की उपस्थिति का अगर पता लगाया जा सकता है तो ये बताता है कि भ्रष्ट ताकतों ने जो विज्ञान और टेक्नोलॉजी के दुरुपयोग के दम पर चक्रव्यूह बनाया है, वो अभेद्य नहीं है। विज्ञान के दम पर ही उसका तोड़ निकाला जा सकता है।
धन्यवाद।

रविवार, जनवरी 12, 2020

इंसानी शरीर हैकिंग : मानवता के लिए खतरा

नोट : इस लेख को सिर्फ व्यस्क ही पढ़ें। इस लेख में मैंने कुछ ऐसे शब्दों व विषयों पर चर्चा की है, जिन पर साधारणतः मैं कभी भी, कुछ भी लिखना नहीं चाहूंगा।  मगर इस लेख का विषय बहुत गंभीर है, जिस कारण मुझे मजबूरन कुछ विषयों पर लिखना पड़ा है। उम्मीद है कि पाठकगण लेख को पढ़कर विषय की गंभीरता को समझेंगे।

डिस्क्लेमर : प्रस्तुत लेख "इंसानी शरीर की हैकिंग : मानवता के लिए खतरा" सिर्फ और सिर्फ विचार-विमर्श के मकसद से लिखा जा रहा है। इस लेख को लिखने के लिए अनुमानों का सहारा भी लिया जा रहा है जिस कारण से इस लेख में बहुत से तथ्य भ्रामक हो सकते हैं तथा पाठकों को बहुत सी बातें काल्पनिक या साइंस फिक्शन लग सकती हैं। इसलिए आपसे निवेदन है कि आप इस लेख को सिर्फ और सिर्फ आलोचक की दृष्टि से पढ़ें। साथ ही निवेदन यह भी है कि लेख को पूरा पढ़ें। 

ऐसा कहा जाता है कि 84 लाख योनियों में भटकने के बाद बड़े भाग्य से इंसान जन्म प्राप्त होता है। साथ ही, यह भी कहा जाता है कि इंसान सभी जीवों से श्रेष्ठ है। मगर ये भी सच है कि रंग, जाति, धर्म आदि के नाम पर इंसान ही इंसान का शोषण करता है। सिर्फ इंसानों की मूर्खता के कारण प्रकृति और पर्यावरण में बदलाव आ रहे हैं अथवा वे नष्ट हो रहे हैं। पशु-पक्षियों की बहुत सी प्रजातियां या तो लुप्त हो चुकी हैं या लुप्त होने के कगार पर है। इतना ही नहीं, हर साल खरबों रुपए हथियारों पर खर्च किए जाते हैं तथा पूरी दुनिया को खतरे में डाल कर परमाणु बमों के जखीरे पर गर्व किया जाता है।

ऐसे में अगर मस्तिष्क और शरीर को हैक करने की शक्ति इंसान के हाथ में आ जाए तो वह सिर्फ तबाही मचाएगा। दुनिया में कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा। कुछ ताकतें तो भगवान बनने की चाह में शैतान बन जाएंगी और पूरी मानव जाति को इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा। 

परन्तु क्या सचमुच इंसानी शरीर की हैकिंग हो सकती है? मानव जाति पर कौन सा खतरा मंडरा रहा है? क्या इस समस्या का कोई समाधान है? चलिए, इस लेख के द्वारा इन्हीं सवालों का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं :-

1. मस्तिष्क की हैकिंग (Mind Hacking) :- अगर आपने इस ब्लॉग के विज्ञान लेबल वाले पिछले सभी लेखों को पढ़ा है तो आपको पता ही होगा कि विज्ञान ने मस्तिष्क के विचारों को पढ़ना, मस्तिष्क में विचार या शब्द डालना तथा सपनों को कण्ट्रोल करना आदि संभव कर दिया है। वैज्ञानिकों ने तारों से मस्तिष्क को जोड़कर (मेरे विचार से बिना तारों के भी), इलेक्ट्रोड के इस्तेमाल, न्यूरल इम्प्लांट्स, पराश्रव्य आदि की मदद से न सिर्फ विचारों को देखने, सुनने व पढ़ने का तरीका निकाल लिया है बल्कि उन्हें प्रभावित करने तथा उनमें बदलाव लाने का रास्ता भी खोल दिया है। इन तथ्यों से कुछ हद तक ये सिद्ध हो जाता है कि मानव शरीर की हैकिंग संभव है।

मस्तिष्क की हैकिंग से निम्नलिखित लक्षण व समस्याएं उत्पन्न होती हैं :- उलटी आना, चक्कर आना, एकदम से शरीर के आगे अँधेरा छाना, शरीर का संतुलन खोना, सिर सुन्न होना, एकदम से मुंह में शब्द आना, गुस्सा आना या निराशा आना, नींद ज्यादा आना, बेहोशी जैसी नींद आना, कई बार ऐसा महसूस होना जैसे सिर पर कोई नियंत्रण ही नहीं है, मति भ्रम (Hallucination) होना, सपनों में फिल्म जैसा चलना तथा ज्यादातर ख़राब या नकारात्मक सपने आना, बातों को भूलना, एकाग्रता खराब होना आदि।

2. शॉक वेव्स (Shock Waves):- टारगेटेड इंडिविजुअल्स बहुत बार अपनी समस्याओं में "Electronic Rape" शब्द का भी उल्लेख करते हैं। इस शब्द पर ज्यादा कुछ लिखने के बजाए लिंक्स देना उचित है, जिन्हें आप स्वयं पढ़ सकते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि लिंक्स में बताए गए शॉक वेव तथा बिजली के झटकों का सीधा या परोक्ष रूप से उपरोक्त शब्द से संबंध है तथा शॉक वेव्स के साथ डोप्पलर इफेक्ट का भी दुरुपयोग हो रहा है। गैंग स्टाल्कर्स के बारे में सर्च करते वक्त मुझे (बदकिस्मती से) इस विषय से जुड़े लेख व समाचार मिले थे।  क्या शॉक वेव ध्वनि तरंगों का कोई रूप है? इसके बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं मिली तथा इसका जवाब कोई विशेषज्ञ ही दे सकता है।

इस विषय के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए निम्नलिखित लिंक्स क्लिक करें :-
1. Penile Low-Intensity Shock Wave Therapy: A Promising Novel Modality for Erectile Dysfunction
2. Why ‘Shockwave’ Therapy for ED Isn’t Ready for Prime Time
3. A meta-analysis of extracorporeal shock wave therapy for Peyronie’s disease
4. Shock wave therapy hope for people with ED
5. Scientists promote 'shocking' way to beat erectile dysfunction
6. Zapping man's private parts with electric current could cure erectile dysfunction

3. कंपन :- कम्पन (Vibrations) को शरीर के लिए बहुत हानिकारक माना जाता है। फैक्टरियों में जो कर्मचारी अपने हाथों से कम्पन वाली मशीनों इस्तेमाल करते हैं, उन्हें आगे चलकर कंपन के कारण हाथ व बाजू कांपने, सुन्न होने तथा कुछ महसूस न होने जैसी समस्याओं का खतरा रहता है। इसके अलावा लम्बे समय तक पूरे शरीर में कंपन वाली मशीनों या गाड़ियों के इस्तेमाल से पीठ व खास तौर से कमर में दर्द की समस्या हो जाती है, उदहारण के लिए जैसे कई बार बस में सफर करने के बाद पीठ दर्द हो जाता है।

इस अवांछित कंपन को भी गैंग स्टाल्कर्स ने हथियारों के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। कंपन उत्पन्न करने के लिए मैकेनिकल अथवा इलेक्ट्रो-मैकेनिकल आसिलेटर (Mechanical or Electro-Mechanical Oscillators) का प्रयोग किया जाता है। ऐसा लगता है कि गैंग स्टाल्कर्स इस उपकरण को टारगेट के घर के नीचे स्थापित करते हैं। इसके लिए घरों के साथ बनाए गए बरसाती नाले अथवा सीवर का इस्तेमाल किया जाता है। जब इस आसिलेटर को चलाया जाता है तो सिर्फ टारगेट के घर के फर्श और दीवारों आदि में बारीक कंपन महसूस होती है।

आसिलेटर की फ्रीक्वेंसी सेट करने पर वह एक ही गति से चलता रहता है जिस कारण घर के बिस्तर, फर्नीचर आदि हर चीज कंपन के गिरफ्त में आ जाते हैं तथा उनमें भी कंपन होने लगता है। ऐसे में टारगेट कहीं पर भी लेटे या बैठे, वह इस कंपन से बच नहीं सकता है। जब भी आसिलेटर चलता है तो सूक्षम गड़गड़ाहट की सी आवाज आती है तथा कानों में दबाव महसूस होता है। मगर इस तरह की आवाज को सुनना अथवा दबाव महसूस करना व्यक्ति विशेष के ऊपर निर्भर करता है तथा जरुरी नहीं है कि घर के हर सदस्य को ये आवाज सुनाई दे।

इस तरह के कंपन का विरोध करना बहुत मुश्किल हो जाता है क्योंकि ये आवाज चहुं दिशाओं (Surround Sound, Omnipresent) से महसूस होती है जिससे इसका स्रोत खोजना मुश्किल होता है। इस आसिलेटर के पॉवर पर निर्भर करता है कि ये कितने क्षेत्र पर अधिक तीव्र चलेगा जिससे एक कमरे में अधिक तीव्रता से कंपन महसूस होती है जब कि दूसरे कमरे में न के बराबर। इस उपकरण की फ्रीक्वेंसी और तीव्रता पर इसका प्रभाव निर्भर करता है। इसके अलावा कई बार ध्वनि तरंगों (अनुदैर्ध्य तरंग व अनुप्रस्थ तरंग) से भी कंपन जैसी स्थिति उत्पन्न करके टारगेट को निशाना बनाया जाता है।

आसिलेटर से उत्पन्न लक्षण व समस्याएं :- शुरुआत में इस आसिलेटर से उत्पन्न कंपन से सोते वक्त तेज गर्मी व पसीने आते हैं। इसका कारण यह है कि कंपन के कारण शरीर की वसा (Fats) तेजी से जलती है, ठीक उसी प्रकार से जैसे वाइब्रेटिंग बेल्ट (Vibrating Belts) काम करता है। सर्दियों में कम्बल ओढ़ने के कारण कम्पन की गति और तेज हो जाती है। ऐसे में महीने भर में 10-15 किलो तक वजन घटना मामूली बात है। धीरे-धीरे जब शरीर में वसा की कमी होने लगती है तब आसिलेटर से उत्पन्न कंपन से ठण्ड से कंपकंपी भी छूटने लगती है। कुछ भी खाओ शरीर को नहीं लगता है। शरीर सूख के कांटा हो जाता है।

कंपन से बदहजमी, हिचकी लगना, पेट खराब होना, अत्याधिक कब्ज होना, नाक में सूजन आना या कुछ लोगों की नाक से खून निकलना, सो कर उठने पर जलने की सी बदबू आना, सांस लेने में दिक्कत, दिल की धड़कन बहुत तेज हो जाती है (जो कि आसिलेटर से उत्पन्न कम्पन की गति पर निर्भर करता है), मुंह में कड़वाहट, शरीर में ऊर्जा अथवा बिजली के दौड़ने का सा एहसास होना आदि लक्षण प्रमुख हैं।

4. सोनिक पल्स (Sonic Pulse) :- सोनिक हथियार वे हथियार हैं जिनका उपयोग टारगेट को चोट पहुंचने, पंगु बनाने अथवा मारने के कार्य में होता है। सोनिक हथियार के कुछ रूप हैं - सोनिक गोली, सोनिक ग्रेनेड, सोनिक तोप (Canon) तथा सोनिक माइन (Mine)। मगर यहां सिर्फ सोनिक पल्स या स्पन्द के बारे में बात हो रही है जो कि शायद सोनिक गोली की परिभाषा में आती है। गैंग स्टाल्कर्स इस ऊर्जा गोली से टारगेटेड इंडिविजुअल्स के शरीर को निशाना बनाते हैं, कुछ वैसे ही जैसे कि बंदूक से गोली मारी जाती है मगर इससे उत्पन्न परिणाम बंदूक की गोली से बिलकुल अलग होता है।

ये पल्स असल में ध्वनिक ऊर्जा होती है जो कि दिखाई नहीं देती है। इस पल्स को टारगेट के शरीर के किसी भी हिस्से में मारा जा सकता है जिससे तीव्रता के अनुसार उनके शरीर में सुई की सी चुभन से लेकर तेज दर्द (जो कि कुछ घंटे से लेकर कई दिन तक रह सकता है) जैसे असर उत्पन्न किए जा सकते हैं। इसके अलावा इस पल्स को एक के बाद एक सृंखला (Series) में भी निशाना मारा जा सकता है जिससे  शरीर में बारीक झटके (कुछ कुछ वैसे ही जैसे कि आंखें फड़फड़ाती है या कई बार कुदरती हाथ या पांव में झटके लगते हैं) भी उत्पन्न किए जा सकते हैं।

इस विषय में थोड़ी जानकारी के लिए निम्नलिखित लिंक्स को क्लिक करें :-
1. Sonic weapon
2. "Sound Bullets" to Zap Off Tumors?

पल्स से उत्पन्न लक्षण व समस्याएं :- इस पल्स का इस्तेमाल टारगेट को परेशान (Disturbed) और आतंकित करने के लिए होता है। पल्स अदृश्य होने की वजह से पता ही नहीं लगता कि ये किस दिशा से चलाई जा गई है जिससे नकारात्मकता, डर और असहाय होने का एहसास होता है। इस पल्स से ब्रेन वाश करने की कोशिश की जाती है तथा हर नकारात्मक बात पर (जैसे कि फिल्म के नकारात्मक दृश्य पर) टारगेट को अलग-अलग  तरह के पल्स मारे जाते हैं जिससे टारगेट का मस्तिष्क धीरे-धीरे सिर्फ नकारात्मकता को देखने का आदि हो जाता है।

 इस तरह की पल्स या ऊर्जा गोली का एक खास प्रयोग भी होता है। इस ध्वनि पल्स को पुरुषों के गुप्त स्थान पर मारा जाता है जिससे उन्हें कृत्रिम नपुंसकता जैसी समस्या होती है। इस कृत्रिम स्थिति (कृत्रिम या स्थाई करना गैंग स्टाल्कर्स की मर्जी पर निर्भर करता है) को बरकरार रखने के लिए टारगेट के गुप्त अंग को लगातार निश्चित समय अंतराल पर निशाना बनाया जाता है। ऐसी स्थिति में टारगेट गहरे डिप्रेशन से ग्रस्त हो सकता है तथा बहुत बार ब्लैकमेल भी किए जाते हैं।
  
5. हम्म साउंड (Hum Sound):- इस ब्लॉग के लेख "ध्वनि : उपयोग और दुरूपयोग (5) Part-2" में मैंने आपको हम्म साउंड के बारे में बताया था। इस ध्वनि को भी सुन पाना व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है। हम्म साउंड को बिजली के ट्रांसफार्मर से निकलने वाली आवाज होती है जिसे मैन्स हम्म (Mains Humm) भी कहा जाता है।

लक्षण व समस्याएं :- इससे सरदर्द, बेचैनी, उलटी आना, एकाग्रता न हो पाना, नींद न आना आदि समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इस हम्म साउंड का उपयोग शायद मस्तिष्क के विचारों को पढ़ने के लिए भी होता है। इसके पीछे तर्क सिर्फ इतना है कि ध्वनि तरंगों हो या इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें हों सबकुछ उसकी फ्रीक्वेंसी पर निर्भर करता है।

6. लेड मस्तिष्क नियंत्रण (LED Mind Control) :- विज्ञान के क्षेत्र में लेड की रौशनी से भी मस्तिष्क को पढ़ने व नियंत्रित करने के विषय पर भी रिसर्च हो रहा है। लेड की रौशनी की निश्चित वेवलेंग्थ (wavelength), कलर और टोन (tone) से कई तरह के जैविक व व्यवहार परिवर्तन होते हैं। इसी आधार पर मस्तिष्क पर भी रिसर्च किया जा रहा है। इससे उत्पन्न लक्षण व समस्याओं के बारे में फिलहाल कोई जानकारी नहीं है।

इस विषय ज्यादा जानकारी के लिए निम्नलिखित लिंक्स को क्लिक करें :-
1. A New Use for LEDs: Mind Control
2. How to Use Light to Control the Brain
3. Scientists Use Precise Flashes of Light to Implant False Memories in Fly Brains
4. Mind control with sound and light

7. वियर-एबल  गैजेट्स (Wearable Gadgets) :- आजकल बहुत सी स्मार्ट वियर-एबल गैजेट्स उपलब्ध होने लगी हैं। ये गैजेट्स रक्तचाप, दिल की धड़कन पर नजर रखने, दूरी, कदमों और कैलोरी को मापने जैसे बहुत से कार्यों में सक्षम होते हैं। मगर हैकर्स इन गैजेट्स को हैक करके लोगों के व्यक्तिगत एवं स्वास्थ्य डाटा को चुराते हैं।

इस बारे में ज्यादा जानकारी के लिए निम्नलिखित लिंक्स को क्लिक करें :-
1. Protecting against the misuse of data from wearables
2. 10 things you need to know about the security risks of wearables
3. How can wearables affect our lives?
4. Misuse Of Electronic Gadgets

डाटा का दुरुपयोग :- कोई भी व्यक्ति इस तरह के डाटा को क्यों चुराना चाहेगा? ऐसा लगता है कि बहुत ही बड़े स्तर पर शरीर के डाटा इकट्ठा किए जा रहे हैं। क्या आपको नहीं लगता कि इस डाटा पर रिसर्च करके शरीर को हैक करने के तरीके ईजाद किए जा सकते हैं अथवा हैकिंग की तकनीक को बेहतर किया जा सकता है?

8. चिकित्सा और हथियार :- चिकित्सा जान बचाने के लिए होती है जबकि हथियार जान लेने अथवा नुकसान पहुंचाने के लिए। मगर अब चिकित्सा में काम आ सकने वाले उपकरणों एवं तकनीक का उपयोग हथियार तथा मस्तिष्क और शरीर की हैकिंग के कार्य में होने लगा है।

दुरुपयोग :- शॉक वेव्स (उपरोक्त विषय की चिकित्सा में उपयोगी हो सकता है), साउंड बुलेट्स (ट्यूमर को नष्ट करने में उपयोगी हो सकता है), पराश्रव्य (चिकित्सा के क्षेत्र में पराश्रव्य के कई उपयोग हैं), डोप्पलर इफेक्ट (रक्त के बहाव को नापने में उपयोग होता है) आदि का दुरुपयोग मस्तिष्क और शरीर की हैकिंग के लिए हो रहा है।

मानवता के लिए गंभीर खतरा


वैसे तो शरीर के सभी अंग महत्वपूर्ण होते हैं मगर उनमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण स्थान मस्तिष्क का होता है। मस्तिष्क का मुख्य कार्य ज्ञान, बुद्धि, तर्क शक्ति, स्मरण, विचार निर्णय, शरीर, व्यक्तित्व आदि का नियंत्रण एवं नियमन करना होता है। इसी मस्तिष्क से हमारा वजूद है तथा इसी के कारण हम सब की सोच समझ, व्यक्तित्व तथा पहचान अलग -अलग  होती है। मस्तिष्क ही हमें पशुओं से अलग करता है।

अगर मस्तिष्क ही हैक हो जाए तो इसके कितने भयानक परिणाम हो सकते हैं, जरा इसकी कल्पना करके देखिए। न तो मानव जीवन का कोई महत्त्व रहेगा तथा न ही व्यक्तिगत आजादी के कोई मायने रहेंगे। न कोई निजता होगी और न ही कुछ गुप्त होगा फिर चाहे वे व्यक्तिगत हों, सामाजिक हो अथवा कारोबार व फाइनेंस से जुड़ी बातें। इतना ही नहीं, किसी भी देश की सुरक्षा, स्वतंत्रता एवं संप्रभुता तक खतरे में पड़ सकती है।

 मस्तिष्क हैक होने लगे तो दुनिया में हर जगह आतंक, असुरक्षा और अराजकता का माहौल होगा। ऐसी स्थिति में किस प्रकार के अपराध होंगे जरा सोच के देखिए। इंसानों के मस्तिष्क से उनके बैंक खातों के पासवर्ड चुराए जाएंगे, विचारों पर डाके डाले जाएंगे तथा किसी का भी ब्रेन वाश करना व सोच-समझ पर काबू करना मामूली बात होगी। ब्लैकमेल का काम जोरों पर होगा तथा किसी को भी विक्षिप्त बनाना या घोषित करना चुटकियों का काम होगा। लोगों को जोम्बी (Zombie) बनाकर किसी भी अपराध या आतंकवादी घटनाओं में इस्तेमाल किया जाएगा तथा मनचाहे झगड़े और दंगे-फसाद कराए जा सकेंगे। जमीन-जायदाद हड़पना बहुत आसान होगा।

कौन अपराध करा रहा है, कुछ पता ही नहीं चलेगा। ऐसे हालात में अदालतों में केस चलने का कोई मतलब ही नहीं रहेगा। सिर्फ कुछ ताकतें तय करेंगी कि किसे गुलाम बनाया जाए तथा किसे मनचाही क्षति पहुंचाई जाए। मानव जाति की हैसियत कीड़े-मकोड़ों की सी होगी, विरोध करने वालों को खत्म कर दिया जाएगा तथा सोच पर भी पहरे लगेंगे।

क्या निकट भविष्य में ऐसी स्थिति होगी कि आपके मस्तिष्क के विचारों पर हर वक्त निगरानी रखी जाएगी? वर्तमान में ही चीन में ये स्थिति आ गई है कि वहां कुछ फैक्टरियों (Factories) में कर्मचारियों को सिर पर खास तरह का हेलमेट पहनना पड़ता है ताकि इस बात पर नजर रखी जा सके कि वे काम के वक्त, अपने काम के अलावा, कुछ और तो नहीं सोच रहे।

इस बारे में ज्यादा जानकारी के लिए निम्नलिखित लिंक्स को क्लिक करें :-
1. 'Mind-reading’ tech being used to monitor Chinese workers' emotions
2. Helmets that measure your emotional state? China is on it
3. China Claims It's Scanning Workers' Brainwaves to Increase Efficiency and Profits

ऐसे में अगर मस्तिष्क के अलावा शरीर के अंगों की भी हैक होने लगे तो स्थिति हमारी सोच से भी ज्यादा भयावह होगी। कोई भी व्यक्ति सुरक्षित नहीं रहेगा। ऐसी स्थिति अघोषित तानाशाही की होगी (जिसके कि टारगेटेड इंडिविजुअल्स तथाकथित तौर पर गवाह हैं) अथवा घोषित तानाशाही होगी, ये तो समय ही बताएगा। अभी तो मस्तिष्क पर ये कहकर रिसर्च हो रहा है कि इससे चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत फायदा होगा मगर ये समझने वाली बात है कि इस तकनीक का व्यापक स्तर पर दुरुपयोग होगा (या होना शुरू भी हो गया है)।

ऐसे में जरूरत इस बात की है कि इस विषय पर अभी से विश्व-मंच पर चर्चा शुरू की जाए तथा दुरुपयोग को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए जाएं।

► समस्या का समाधान :- इंसानी शरीर की हैकिंग अगर पूरी तरह से संभव हो जाए तो ये बहुत भयानक समस्या बन सकती है। इस विषय पर निम्नलिखित कुछ समाधान हो सकते हैं :-

1. जागरुकता :- ये विषय दुनिया के हर इंसान से जुड़ी है, इसलिए अभी से इस विषय पर हर व्यक्ति को इस विषय में जागरुक होना चाहिए। ये बहुत ही कठिन कार्य है क्योंकि लोग अपनी निजता और अधिकारों को लेकर पूरी तरह से उदासीन हैं। मोबाइल में एप्प्स किस तरीके की जानकारी, डाटा और सेटिंग की आज्ञा मांगते हैं, इस बात को अधिकतर लोग गंभीरता से नहीं लेते हैं। इसके अलावा इंस्टाग्राम, फेसबुक, टिकटोक, व्हाट्सएप्प आदि सोशल एप्प्स (जिनमें से कुछ का मैंने भी उपयोग किया है) पर बिना सोचे-समझे अपनी दिनचर्या की सेल्फी एवं निजी जानकारियां शेयर करते हैं। यहां तक कि बच्चों को भी मोबाइल का लत लगाया जा रहा है तथा सोशल एप्प्स पर उनके अकाउंट खोले जाते हैं।

ऐसे में क्या लोगों के पास इतना समय है कि वे अपनी निजता, अधिकारों आदि के बारे में जागरुक हो सकें? क्या वे मस्तिष्क के विचारों को पढ़ने एवं नियंत्रण करने की आज्ञा सहज ही दे देंगे?

2. एकता :- लोगों में इतनी एकता और भाईचारा होनी चाहिए कि समाज का कोई भी व्यक्ति गैर कानूनी तरीकों से टारगेटेड इंडिविजुअल्स न बनने पाएं। साथ ही परिवारों में भी एकता होनी चाहिए। मगर क्या समाज में इतनी एकता होगी?

3. पासवर्ड की जरूरत न रहे :- यूट्यूब की किसी वीडियो में मैंने ऐसा सुना था कि 5G नेटवर्क आने पर बैंक, मेल आदि के लिए पासवर्ड जरूरी नहीं रहेगा। मोबाइल ही वेरिफिकेशन के लिए काफी रहेगा। साथ ही ये भी सुनने में आया था कि बैंक धीरे-धीरे ब्लॉक चैन टेक्नोलॉजी (Block Chain Technology) जिससे व्यक्ति की वेरिफिकेशन आसानी से हो सकती है। मगर ये बातें सही हैं या नहीं अथवा ऐसी कोई तकनीक भविष्य में आएगी या नहीं, ये तो आने वाला समय ही बताएगा। फिलहाल मेल में डबल वेरिफिकेशन (Double Verification) की सुविधा दी जाने लगी है। लोगों को इस वेरिफिकेशन का लाभ उठाना चाहिए।

साथ ही, बैंकों से भी ये मांग की जानी चाहिए कि बैंकों के ट्रांसेक्शन में भी डबल पासवर्ड वेरिफिकेशन शुरू होनी चाहिए। अर्थात सिर्फ ट्रांसेक्शन के समय ही नहीं बल्कि लॉग इन (Log In) के वक्त भी ओटीपी (OTP or One Time Password)  वेरिफिकेशन होना चाहिए।

4. मानव अधिकारों की सुरक्षा के लिए कानून बने :- हर देश के लोगों को सरकार से ये मांग करनी चाहिए कि मस्तिष्क के विचारों की रीडिंग, नियंत्रण अथवा सोच-समझ को प्रभावित करने तथा शरीर के अंगों की हैकिंग आदि को रोकने के लिए कानून बनाए जाएं, जिनका उल्लंघन करने वाले को बहुत कठोर दंड मिले। इस बात का भी ध्यान रखा जाए कि किसी को भी असीमित शक्ति न मिले।

मानव अधिकारों की सुरक्षा का विचार निम्नलिखित लेख से लिया गया है :-
1. New human rights to protect against 'mind hacking' and brain data theft proposed
2. Towards new human rights in the age of neuroscience and neurotechnology

5. सूचना का अधिकार :- हर देश के नागरिकों को ये मांग करनी चाहिए कि मस्तिष्क हैकिंग आदि के विषय में क्या-क्या रिसर्च चल रहा है, कौन-कौन सी उपलब्धि प्राप्त हो चुकी है तथा इनका किस कार्य के लिए कहां-कहां उपयोग होगा। वैसे भी लोगों के टैक्स के पैसों से ही विज्ञान के क्षेत्र में इस विषय पर रिसर्च हो रहा है तो लोगों का ये अधिकार होना चाहिए कि विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी के क्षेत्र की हर जानकारी उन्हें मिले।

ये मांग भी होनी चाहिए कि लोगों को ऐसे उपकरण उपलब्ध कराए जाएं जिससे वे अपनी सुरक्षा कर सकें। ऐसे उपकरणों से ये पता चल सके कि गैर क़ानूनी ढंग से मस्तिष्क के विचारों को पढ़ने या नियंत्रित करने आदि की कोई कोशिश तो नहीं कर रहा है। साथ ही, इस तरह की टेक्नोलॉजी का दुरुपयोग के बारे में भी पूरी जानकारी मिले।

धन्यवाद।  

सोमवार, दिसंबर 09, 2019

गैंग स्टाल्कर्स और टारगेटेड इंडिविजुअल्स (6)

(नोट - इस लेख मे आपको ज्यादा लिंक्स नहीं दिए जा रहे हैं। इंटरनेट पर गैंग स्टाल्कर्स और टारगेटेड इंडिविजुअल्स के बारे में कई लेख पढ़ कर जो कुछ भी मुझे समझ आया है, उन्हीं विचारों को मैं यहां अपने शब्दों में लिखने की कोशिश कर रहा हूं। इसलिए इस लेख पर भरोसा करना या न करना आपकी मर्जी पर निर्भर करता है। )

Gang Stalkers

गैंग स्टाल्कर्स हर युग में किसी न किसी रूप में मौजूद रहे हैं। रंग-भेद व नस्ल-भेद (Apartheid and Racism) एक तरह से संगठित अपराध की मानसिकता ही तो थी जो कि आज भी कभी-कभार देखने को मिल जाता है। क्या जातिवाद और अस्पृश्यता (Untouchability) भी समूह में अपराध करने की सोच नहीं थी/है? क्या पुरातन काल में राक्षस भी गिरोह में ऋषियों और आम लोगों को परेशान नहीं किया करते थे? और क्या ड्रग्स अथवा नशे की लत डालने वाले शैतान भी संगठित अपराध की श्रेणी में नहीं आते हैं? 

वर्त्तमान समय में भी संगठित अपराध के कई प्रकार मौजूद हैं मगर इस लेख में मानसिक उत्पीड़न करने के अलावा अदृश्य हथियार व विज्ञान का दुरुपयोग करने वाले गैंग स्टाल्कर्स पर ही विचार किया गया है। "गैंग स्टाल्कर्स" का मतलब है "गिरोह में निशाना बनाने वाले।" इस गिरोह को संगठित अपराध करने वाला गिरोह भी कहा जा सकता है। इनके शिकार करने का तरीका ठीक वैसा ही होता है जैसा कि जंगल में लकड़बग्घे (Hyena) अपना शिकार करते हैं। ये गिरोह जिन लोगों को अपना निशाना बनाते हैं, उनके लिए "टारगेटेड इंडिविजुअल्स" (Targeted Individuals) शब्द का इस्तेमाल होने लगा है जिसका अर्थ है "शिकार या प्रताड़ित व्यक्ति।"

ये गैंग स्टाल्कर्स बहुत ही ज्यादा शातिर और धूर्त होते हैं और इनके कार्य करने का तरीका भी बहुत ही भयानक और क्रूर होता है। यह अपने शिकार पर 24x7x365 दिन तथा सालों-साल नजर रखते हैं और उन्हें परेशान (Disturbed) रखते हैं। ये गिरोह अपने शिकार की हत्या भी सीधे नहीं करते बल्कि धीरे-धीरे उन्हें बीमार करके मारते हैं। असल में इन्हें पर पीड़ा का सुख पाने की बीमारी होती है। इस गिरोह में हर उम्र और वर्ग के लोग शामिल होते हैं अथवा उनका बरगला कर इस्तेमाल होता है। इसलिए इनके कार्यों को "घरेलू आतंकवाद" (Domestic Terrorism) भी कहा जाता है अर्थात इस तरह के आतंकवाद में किसी विदेशी शक्ति का हाथ नहीं होता है। इसके अलावा आतंकवाद के साथ 'घरेलू' शब्द शायद इसलिए जोड़ा गया है क्योंकि गैंग स्टाल्कर्स 'घरेलू हिंसा' के तर्ज पर अपने शिकार को उसी के घर के अंदर सबसे ज्यादा निशाना बनाते हैं। आप शायद यह जानकर हैरान रह जाएं कि पीड़ित व्यक्ति को सोते वक्त भी अदृश्य हथियारों से निशाना बनाया जाता है, जब वह अपना बचाव करने की स्थिति में नहीं होता है!

गैंग स्टाल्कर्स  के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए आप निम्नलिखित लेख क्लिक करके पढ़ सकते हैं :-

Who Gets Targeted

गैंग स्टाल्कर्स किसी व्यक्ति का शिकार क्यों करते हैं यह तो कई बार शिकार व्यक्ति को भी पता नहीं होता है। ऐसा कहा जाता है कि यह सिर्फ मजे के लिए भी किसी व्यक्ति या परिवार की जिंदगी बर्बाद करते हैं मगर इनका असली मकसद प्रॉपर्टी हड़पना, किसी केस को एकतरफा बनाना, किसी की नौकरी हथिया कर अपने किसी खास को नौकरी दिलाना, किसी का मुंह बंद करना, हत्या, ब्लैकमेल आदि होता है। मगर लोगों को टारगेट बनाने के पीछे इनका एक बेहद खतरनाक मकसद भी छिपा होता है, और वह मकसद है नई टेक्नोलॉजी तथा विज्ञान के दुरुपयोग पर आधारित हथियारों को लोगों के ऊपर अवैध टेस्ट करना तथा इन नए किस्म के "जैविक हैकिंग"(Biological Hacking) को बेहतर बनाना! (नोट :- यह हथियार "जैविक हैकिंग या हथियार" कैसे है, इस पर आने वाले लेख में चर्चा की जाएगी)

शिकार व्यक्ति को क्या-क्या परेशानी आती है, उस बारे में जानने के लिए आपको निम्नलिखित लिंक (जो कि Change.org की एक ऑनलाइन याचिका का लिंक है) को क्लिक करके पढ़ना होगा, जहां पर पीड़ितों के लक्षण विस्तार से बताए गए हैं :-

► Stop people from using psychotronic weapons

(नोट:- इंटरनेट पर गैंग स्टाल्कर्स तथा टारगेटेड इंडिविजुअल्स पर बहुत से भ्रामक लेख मौजूद हैं तथा कुछ तत्व  तो जानबूझकर इंटरनेट पर गलत जानकारी डालते हैं। यहां तक कि पीड़ित व्यक्ति भी सही जानकारी के अभाव में गलत जानकारी डाल देते हैं जिसमें कि उनकी पीड़ा और तकलीफ तो सही होती है मगर कारण पूरी तरह तर्कसंगत नहीं होते हैं। इसलिए इंटरनेट पर इस तरह के विषयों के बारे में पढ़ते समय आप बहुत सावधानी बरतें। मैंने अपने ब्लॉग पर बहुत सावधानीपूर्वक लिंक्स डाले हैं मगर मैं आप से निवेदन करता हूं कि आप इन लिंक्स को स्वयं पढ़कर देखें और तय करें कि ये विश्वास करने योग्य हैं कि नहीं।)

Why is it difficult to stop Gang Stalkers

गैंग स्टाल्कर्स बहुत ताकतवर गिरोह है। अगर किसी को पता भी चल जाए कि यह कौन लोग हैं तो भी इनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। बहुत बार तो इस तरह के अपराध को रोकने वाले लोग ही इस तरह के अपराधों को अंजाम देते हैं। 

भारत में स्टॉल्किंग के लिए 2013 में Criminal Law (Amendment) Act द्वारा Section 354D जोड़ी गई थी, जिसकी व्याख्या इस प्रकार है :-

(1) Any man who—

(i) follows a woman and contacts, or attempts to contact such woman to foster personal interaction repeatedly despite a clear indication of disinterest by such woman; or

(ii) monitors the use by a woman of the internet, email or any other form of electronic communication,commits the offence of stalking;

Provided that such conduct shall not amount to stalking if the man who pursued it proves that—

(i) it was pursued for the purpose of preventing or detecting crime and the man accused of stalking had been entrusted with the responsibility of prevention and detection of crime by the State; or

(ii) it was pursued under any law or to comply with any condition or requirement imposed by any person under any law; or

(iii) in the particular circumstances such conduct was reasonable and justified.

(2) Whoever commits the offence of stalking shall be punished on first conviction with imprisonment of either description for a term which may extend to three years, and shall also be liable to fine; and be punished on a second or subsequent conviction, with imprisonment of either description for a term which may extend to five years, and shall also be liable to fine.

उपरोक्त धारा 354D के बारे में आप इंटरनेट पर सर्च कर सकते हैं। ये धारा सिर्फ महिलाओं की सुरक्षा के लिए है। मगर जिस गैंग स्टॉल्किंग की यहां चर्चा हो रही है, उसमें पुरुष भी शिकार होते हैं तथा उनके द्वारा जिस प्रकार के अदृश्य हथियारों का इस्तेमाल होता है, उससे पुरुष और महिला दोनों ही सुरक्षित नहीं हैं। 

असल में अदृश्य हथियारों से किए जाने वाले अपराधों को रोकने के लिए भारत में (तथा संभवतः विश्व में) कोई कानून बना ही नहीं है। उदहारण के लिए उपरोक्त लिंक "Stop people from using psychotronic weapons" में जाकर देखिए, उसमें पीड़ितों जो परेशानी भुगतते हैं, उस लिस्ट में एक शब्द है "Electronic Rape"। इस शब्द में क्या गड़बड़ी है, इस शब्द का क्या अर्थ है तथा यह किस प्रकार से अदृश्य तरीके से संभव है इस बारे में आने वाले लेख पर चर्चा की जाएगी। 

Why it is difficult to stop Gang Stalkers

गैंग स्टाल्कर्स को रोकना क्यों मुश्किल है, इस बारे में निम्नलिखित कुछ कारण हो सकते हैं :- 

1. गैंग स्टाल्कर्स न सिर्फ खुद गिरोह में लोगों को टारगेट बनाते हैं, बल्कि आम लोगों के द्वारा भी पीड़ित व्यक्ति को परेशान करवाते हैं। जिस प्रकार फिल्म "मालामाल वीकली" में  मृत व्यक्ति की लॉटरी की रकम को प्राप्त करने के लिए लगभग पूरा गांव पार्टनर बन जाता है, ठीक इसी प्रकार से गैंग स्टाल्कर्स भी साम, दाम, दंड, भेद, छल, कपट, लालच, ईर्ष्या, नफरत आदि हथकंडों से बहुत से मासूम लोगों को बरगलाकर इस प्रकार का अपराध करवाते हैं। मालामाल वीकली में तो सारा गांव मालामाल हो जाता है मगर असल जिंदगी में ठगी व धोखाधड़ी द्वारा लोगों को बेवकूफ बनाकर उनसे मुफ्त में अथवा बहुत कम खर्च में यह घृणित अपराध कराया जाता है। ऐसे में गैंग स्टाल्कर्स को पहचानना बहुत कठिन हो जाता है।

2. शिकार व्यक्तियों को अक्सर मानसिक रूप से परेशान बता दिया जाता है, जिससे लोग पीड़ित व्यक्ति की बातों को गंभीरता से नहीं लेते तथा गैंग स्टाल्कर्स मनचाहे ढंग से पीड़ित व्यक्ति अथवा परिवार को परेशान करते हैं। 

3. गैंग स्टाल्कर्स जिस तरह के अदृश्य हथियार जैसे कि ध्वनिक हथियार, विद्युतचुम्बकीय हथियार का उपयोग करते हैं, उस बारे में लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं होती। इसके अलावा कुछ हथियार तो दीवार के आर-पार जाकर भी निशाना बना सकते हैं।  इसलिए इस तथाकथित भूत गिरोह (Ghost Gang) के बारे में कुछ भी पक्के तौर पर कहना मुश्किल हो जाता है।

4. गैंग स्टाल्कर्स "व्यक्ति आधारित विज्ञापन" (Personalized Advertisement) के तर्ज पर "व्यक्ति आधारित उत्पीड़न" (Personalized Harassment) करते हैं :-

► व्यक्ति आधारित विज्ञापन :- इस तरह के विज्ञापन के लिए लोगों द्वारा इंटरनेट या मोबाइल एप्प में किए गए इस्तेमाल के आधार पर उन्हें विज्ञापन दिया जाता है। जैसे किसी ने नए मोबाइल के लिए इंटरनेट सर्च किया तो उसी समय उसे मोबाइल या लोन के विज्ञापन आने लगते हैं। इस अनोखे तरीके में लोगों की पर्सनल जानकारियों को तथाकथित विज्ञापन कंपनियों को बेचा जाता है। यहां तक कि लोगों द्वारा ईमेल में की गई गतिविधियों के आधार पर भी उन्हें व्यक्ति आधारित विज्ञापन दिया जाता है।

► व्यक्ति आधारित उत्पीड़न:- गैंग स्टाल्कर्स शिकार व्यक्ति के ऊपर चौबीसों घंटे लगातार निगरानी रखते हैं, फोन टेप करते हैं और उनका डाटा बेस बनाते हैं। उसी डाटा बेस के आधार पर शिकार व्यक्ति को परेशान किया जाता है। उदहारण के लिए किसी को आर्थिक तंगी है तो उसका और अधिक आर्थिक नुकसान कराया जाता है। गैंग स्टाल्कर्स शिकार व्यक्ति को सालों साल परेशान रख सकते हैं, इसलिए उससे सम्बंधित डाटा बेस बढ़ता जाता है। इसके अलावा जिस प्रकार व्यक्ति आधारित विज्ञापन भी बीच-बीच में अपनी मर्जी से ही विज्ञापन दिखाते हैं उसी प्रकार से गैंग स्टाल्कर्स भी पीड़ित व्यक्ति को किसी खास आवाज, वस्तु अथवा व्यक्ति से चिढ़ा कर या परेशान करके उस तरीके को भी डाटा बेस में जोड़ते जाते हैं।

ऐसे में पीड़ित व्यक्ति को लोगों के सामने भी परेशान किया जाए तो भी किसी को पता नहीं लग सकता है। लोगों को सिर्फ उस व्यक्ति का बेवजह परेशान होना दिखता है, परेशानी की वजह नहीं दिखती! इस कारण से पीड़ित व्यक्ति लोगों को कुछ बताने की कोशिश भी करे तो भी किसी को यकीन नहीं होता है। 

इसलिए इस गिरोह के बारे में जानने से अच्छा है कि वे लोगों को निशाना बनाने के लिए जिन तरीकों तथा वैज्ञानिक हथियारों का दुरुपयोग करते हैं, उन तरीकों व हथियारों के बारे में जानकारी प्राप्त करके उसे रोकने का उपाय खोजा जाए। इनको रोका जाना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह सिर्फ कुछ शिकार या पीड़ित व्यक्तियों की बात नहीं है बल्कि इस तरह के गिरोह से पूरी मानवता को खतरा है।

How to stop Gang Stalking?

गैंग स्टाल्कर्स को रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय हो सकते हैं :-

1. लोगों में इस विषय के प्रति जागरुकता लाकर इस समस्या का हल निकल सकता है। एकता में बहुत शक्ति है। लोगों संगठित होंगे तो सरकार को भी ऐसे अपराधों के लिए कानून बनाना पड़ेगा और विज्ञान और टेक्नोलॉजी के दुरुपयोग को अवैध घोषित करना पड़ेगा।

2. अपने घरों में सीसीटीवी लगाएं।

3. सोशल मीडिया पर अपने परिवार की जानकारी न डालें तथा बच्चों को भी सोशल मीडिया से दूर रखें। मोबाइल का इस्तेमाल भी बहुत सावधानी से करें। यूरोपीय संघ ने अपने नागरिकों की डाटा संरक्षण व निजता की सुरक्षा के लिए 25 मई, 2018 से जनरल डाटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (General Data Protection Regulation, European Union) लागू किया है। भारत में डाटा प्रोटेक्शन बिल,2018 पर अभी संसद में विचार होना है। यह कानून लागू हो भी जाए तब भी आप सोशल मीडिया पर निजी जानकारियों को शेयर करने से परहेज करें।

4. गैंग स्टाल्कर्स का असली हथियार तो टेक्नोलॉजी और विज्ञान का दुरुपयोग है। अर्थात विज्ञान और टेक्नोलॉजी से ही इस समस्या का हल भी प्राप्त हो सकता है। दुनिया में ऐसे बहुत से वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर व अन्य टेक्निकल एक्सपर्ट या शौकिया जानकार होंगे जो इस समस्या का तोड़ निकाल सकते हैं। ऐसे लोगों को इस बारे में सोचना चाहिए तथा कुछ न कुछ हल निकलना चाहिए।

5. बच्चों में विज्ञान के प्रति रूचि डालिए। आने वाले समय में विज्ञान से जुड़े लोग ही इस समस्या का हल निकालेंगे।

धन्यवाद।